Good bye mongoose -A dangerous helper

एक सवाल- क्या खाये , क्या न खाये

एक सवाल- क्या खाये , क्या न खाये 

मोटापा, एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। हर कोई इसका हल तलाशने में लगा है। लोग पहले ढेर सारा खा कर मोटे हो जाते हैं, फिर उसे कम करने के लिए तरह-तरह के नुस्ख़ें अपनाते हैं। दिलचस्प बात ये है कि वज़न कम करने के लिए जो तरीक़े अपनाए जाते हैं, उनसे में भी ज़्यादातर कुछ ना कुछ खाने से जुड़े होते हैं। 

#1 अंडा सेहत के लिए अच्छा है नही?

मिसाल के लिए कुछ वक़्त पहले तक ये कहा जाता था कि अंडे खाना सेहत के लिए बुरा है, क्योंकि इससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। लेकिन 1995 एक नई रिसर्च में पता चला कि अगर हर रोज़ दो अंडे खाए जाएं, तो उससे सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। 

बल्कि ये कहा गया कि अंडे में प्रोटीन, विटामिन होते हैं। इसलिए संडे हो या मंडे, रोज़ खाएं अंडे। 


#2 सुपर फ़ूड है काम का  

ब्रिटिश जानकार रोज़मेरी स्टैंटन कहती हैं कि आजकल लोग अपने खान-पान को लेकर बहुत जागरुक हो रहे हैं। खुद को दुबला-पतला और फिट रखने के लिए तरह-तरह के सुपर फूड लेते हैं। 

लेकिन वो ये भूल जाते है कि ये सुपर फूड जादू की छड़ी नहीं हैं. अच्छी सेहत पाने के लिए आपको अच्छा खाना खाना होगा। साथ ही नियमित रूप से वर्जिश करनी होगी. तभी आप सेहतमंद रह सकते हैं। इस दावे के साथ बाज़ार में खान-पान के तमाम प्रोडक्ट उतारने शुरू कर दिए, जो लोगों की ज़रूरत पूरी करने के दावे पेश करते हैं। इसके लिए आपको अलग से किसी की ज़रूरत नहीं रहेगी। प्रोफेसर स्टेंटन कहती हैं कि ऐसे दावे करके कंपनियां लोगों को अच्छे क़ुदरती खाने से दूर करती हैं और बेपनाह मुनाफ़ा बनाती हैं. लेकिन इससे लोगों की सेहत को कोई फ़ायदा नहीं होता। 

#3 काई को भी खा सकते है 

एक और फ़िल्म में ये कल्पना की गई थी कि इंसान की ज़रूरत का सारा प्रोटीन समंदर से लिया जाए। फिलहाल हम सभी जितना प्रोटीन खाते हैं, उसका 16 फ़ीसद हिस्सा समुद्र से ही आता है। शैवाल या एक ख़ास तरह की काई को भी खाने में शामिल किया जा सकता है। जैसे स्प्रिलिना नाम का शैवाल लोग खाते हैं। लेकिन इस दिशा में रिसर्च की जा रही है कि समुद्र में मौजूद पेड़-पौधों में से किस में अच्छे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा मौजूद है? माना जा रहा है कि शैवाल इस तरह की एक फ़सल हो सकती है।

19वीं सदी में फ्रांस के एक प्रोफेसर मार्सिलिन बर्थोल्ट ने कहा था कि आने वाला समय पूरी तरह से केमिकल फूड पर निर्भर होगा। इसी राय को साल 1896 में एक और लेखक ने आगे बढ़ाते हुए कहा था कि एक वक़्त ऐसा आएगा, जब मांस-मछली से मिलने वाले सभी पोषक तत्व एक गोली की शक्ल में आएंगे। साल 1973 में एक फ़िल्म में इस ख़्वाब को बड़े पर्दे पर उतारा गया था। 'सॉयलेंट ग्रीन' नाम की इस फ़िल्म में किरदारों को पोषक तत्वों की केमिकल डाइट पर पलते हुए दिखाया गया था। 

दिलचस्प बात ये कि बाद में 'सॉयलेंट' के नाम से ही एक सप्लीमेंट भी बाज़ार में उतारा गया। अब ये आपको तय करना है कि सेब, मांस से बने व्यंजन या चीज़ खाने के बजाय क्या सिर्फ़ टैबलेट खाकर काम चलाना चाहेंगे?  
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